Mar 26, 2020

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आध्यात्मिकता : रुचि से उत्साह तक, अभ्यास से व्यवहार तक (TÂM LINH: TỪ SỞ THÍCH ĐẾN ĐAM MÊ, TỪ THỰC HÀNH ĐẾN ỨNG DỤNG)

Bản gốc tiếng Việt Nam

आध्यात्मिकताके वल मानव समाज में ही विद्यमान है, अन्य लोकों जैसे पशुओं, प्रेतों, नरक, देवों और असुरों में नहीं। बौद्ध ग्रंथ कहते हैं कि केवल मनुष्य ही साधना कर सकते हैं! तब “आध्यात्मिकता” का सही अर्थ क्या है? इसका आशय है कि किस पर विश्वास करना चाहिए, पवित्र क्या है और सम्मान के योग्य कौन है? हम मानव समाज में ऐसी गतिविधियों को आसानी से देखते हैं जैसे कि अंतिम संस्कार, मृतक की वर्षगांठ या त्योहारों में विश्वास। सम्यक शिक्षण के विभिन्न मार्ग भी तदनुसार स्थापित किए गए हैं, जिन्हें धर्म के रूप में जाना जाता है (अर्थात् एक समुदाय के द्वारा सामान्य विश्वास के साथ देवों, असुरों, प्रेतों, वस्तुओं, अमरों, संतों आदि की पूजा करने की प्रवृत्ति)। बौद्ध धर्म एक तरह से धर्म नहीं है क्योंकि बुद्ध उन विषयों की पूजा नहीं करते थे।

कुछ लोग पैगोडा, मंदिर, चर्च जाना पसंद करते हैं, हालांकि वे किसी भी धर्म का अनुसरण नहीं करते हैं। उन्हें वहाँ केवल अपनी आध्यात्मिक रुचि के कारण ही देखा जाता है। दूसरे लोग किसी भी अंतिम संस्कार और मृत्यु की वर्षगांठ को कभी भी नहीं भूलते, फिर भी उन्हें आध्यात्मिक रुचि से युक्त माना जाता है। एक बार यदि रुचि किसी के लिए एक उपयोगी साधन बन जाता है [तनाव, उदासी को दूर करने या दीर्घकालिक मुदिता को वापस लाने के लिए] और वे हमेशा ऐसा करने के तरीके ढूंढते हैं, तो फिर यह रुचि का प्रदर्शन बन जाता है।

उन्हें आध्यात्मिकता के प्रति अपने उत्साह के लिए धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि कला/संस्कृति के शोधकर्ता की भांति ही आध्यात्मिकता के इस क्षेत्र में नई विशेषताओं या दृष्टिकोणों का पता लगाने के कारण ही उन्हें आध्यात्मिक संस्कृति का शोधकर्ता कहा जाता है। मैक्सिम गोर्की ने एक बार कहा था, “जब कार्य में प्रसन्नता होती है तो जीवन आनंद से युक्त होता है।” ये लोग हमेशा अपनी मानसिकता को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए प्रेरित करते हैं जिसे वे अपना मानसिक जीवन कहते हैं, जैसा कि पुस्किन ने एक बार कहा था, “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं जीवित हूँ।”

जैसा कि पुस्किन ने एक बार कहा था, “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं जीवित हूँ।”

जो लोग उच्चतम स्तर के उत्साह के साथ आध्यात्मिक शोध की गहराईयों को पसंद करते हैं, उन्हें बौद्ध धर्म में विद्वान कहा जाता है। वे अपने स्वयं के तर्कों को सिद्ध करने के लिए सिद्धांत या दर्शन के विश्लेषण सहित शोध में लगे रहते हैं। वे कई किताबें लिखते हैं, कई बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद करते हैं और इस क्षेत्र में नए दृष्टिकोण तलाशते हैं। बड़ा दयनीय होता है जब कुछ प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद कुछ विद्वान अभिमानी हो जाते हैं और स्वयं के विचारों को इतना ऊँचा मानते हैं कि जैसे “वे ब्रह्मांड का केंद्र हैं”। उनकी सबसे बड़ी कमी यह है कि वे अक्सर अपने उन साथियों के साथ जलन या ईर्ष्या महसूस करते हैं जिनकी क्षमता उनके बराबर या उनसे अधिक है। अपने साथियों के खिलाफ आलोचना करते समय या उपेक्षाजनक बोलने के अनुकूल वातावरण के मिलते ही ऐसे नकारात्मक विचार सदैव लड़ाई में बदल जाते हैं। उनके दृष्टिकोण और व्यवहार को मुख्यतः दो कारणों से समझाया जा सकता है: स्वयं के प्रति आसक्ति और धर्म के प्रति आसक्ति। ये दो बड़ी कमियां कई बौद्ध विद्वानों को प्रज्ञाज्ञान से युक्त मुक्ति पाने से रोकती हैं, जिसके पीछे कारण है कि वे शुरू से ही धर्म के सही मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं। एक साधारण व्यक्ति जिसने धर्म के सही मार्ग के अनुसार साधना को विकसित किया है, वह मुक्त हो जाएगा अथवा भविष्य में मुक्ति का कारण होगा। इसके विपरीत, एक असाधारण व्यक्ति जो धर्म के सही मार्ग के खिलाफ जाता है, वह कभी मुक्त नहीं होगा, अपितु भवचक्र में पुनर्जन्म का कारण बनता रहेगा। यह इस तथ्य से पता चलता है कि इन विद्वानों ने साधना के अभ्यास से अनुभव नहीं पाया। यद्यपि वे आश्चर्यजनक तर्क के साथ किसी भी बौद्ध ग्रंथ को आसानी से उद्धृत कर सकते हैं, लेकिन अभ्यास से आने वाले ज्ञान और अनुभव के बारे में पूछे जाने पर वे अभी भी भ्रमित हैं। इसलिए बौद्ध कथाएँ एक ऐसे वृद्ध भिक्खु (थेर) के बारें में बताती हैं, जो जुगाली करती हुई गाय की भांति मात्र एक ज्ञानी आध्यात्मिक प्रशिक्षक कहलाता था; अथवा छठे धर्मप्रधान हुई नेंग ने इस कारण से ही फा-टा नामक एक भिक्खु को फटकार लगाई थी।

जो लोग उच्चतम स्तर के उत्साह के साथ आध्यात्मिक शोध की गहराईयों को पसंद करते हैं, उन्हें बौद्ध धर्म में विद्वान कहा जाता है।

जो एक ही समय में सीखते और अभ्यास करते हैं, वे अभ्यासी कहलाते हैं। एक अभ्यासी एक विद्वान की तुलना में कम जानकार हो सकता है, लेकिन वह अपने मन को विद्वान से बेहतर बनाता है (यानी चिंता और असुरक्षा से मुदिता [प्रसन्नता] और उपेक्खा [समत्व भाव] के लिए)। एक अभ्यासी की आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में मुदिता और उपेक्खा की स्थिति को देखा जा सकता है। इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि लोग गलती से उच्च ज्ञान के एक तथाकथित विद्वान का सम्मान कर सकते हैं, जिसका मन पांच सांसारिक विषों से हिल जाता है। इस बीच एक अभ्यासी प्रशंसा या दोष से कभी भी प्रभावित नहीं होगा क्योंकि वह शील की साधना कर रहा है और सिर्फ सुनना और सीखना पसंद करता है।

जो अभ्यासी अभ्यास कर रहे हैं और जो भी वो सीख रहें हैं उसे प्रभावी ढंग से और पूरी तरह से लागू करने में सक्षम हैं, उन्हे सिद्ध कहा जाता है। वे इस प्रकार मन परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरे हैं: आध्यात्मिक अभ्यास के महत्व का एहसास करना; तब अनुसरण करने के लिए और धर्म का अभ्यास करने के लिए उपयुक्त परंपरा का पता लगाना; फिर बिना संशय के चुने हुए धर्म का परिश्रमपूर्वक अभ्यास करना, और अंत में संपूर्ण और उत्तम ज्ञान अर्थात् निब्बाण प्राप्त करना। उनके लिए सूत्र (बौद्ध महायान सूत्र) अब धर्म हो भी गए हैं और नहीं भी हुए हैं, बशर्ते कि दोनों का अभ्यास किया जाए और बोधिचित्त के मार्ग में प्रदर्शित किया जाए। यह परम पावन 12वें ग्यावलंग ड्रुक्पा द्वारा प्रसिद्ध शिक्षा “धर्म इज लाइफ़, लाइफ़ इज धर्म” में सरल ढंग से बताया गया है।

वे अब कहीं भी और कभी भी बुद्ध धर्म को लचीले ढंग से लागू करने में सक्षम हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस रूप में दिखते हैं: कोमल या क्रोधी। बौद्ध शब्दावली में इसे व्यवहृत बोधिचित्त कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे [सिद्ध] स्वयं को सांसारिक और धर्म के मामलों में आसानी से निपटने के लिए प्राणियों की स्थिति और परिस्थिति के अनुसार पांच नियमों में रखते हैं।

 Luận sư Dharmakirti nêu ra 5 luận điểm sau đây khi thầy dạy học trò:

बौद्ध दार्शनिक और तार्किक धर्मकीर्ति ने पाँच नियमों को

बौद्ध दार्शनिक और तार्किक धर्मकीर्ति ने पाँच नियमों को इस प्रकार बतलाया है-

  1. त्याग करने के लिए क्या आवश्यक है, इसको जानना
  2. उन्हें छोड़ने के तरीकों को पूरी तरह से जानना
  3. किन उद्देश्यों को अभ्यास की आवश्यकता है,को स्पष्ट रूप से जानना
  4. उन्हें अभ्यास करने के तरीकों को पूरी तरह से जानना
  5. बिना शर्त करुणा से छात्रों को ज्ञान प्रेषित करन

गुरु रिनपोछे की शिक्षाओं को निष्कर्ष के रूप में मैं उद्धृत करूंगा: “प्रबुद्ध व्यक्ति के पास सहज पहचान के लिए कोई निश्चित रूप नहीं है; इसके विपरीत धोखेबाज बहुत अधिक पाखंड करता है जिससे उसे पहचानना मुश्किल है। सोने को पाने के लिए तांबे (को प्राप्त करने) की गलती न करें। ”

सभी प्रबुद्ध प्राणी प्रबुद्धता की स्थिति को जागृत करें!

लेखक – थिनले – गुयेन थान (फुओक थान गाँव, वियतनाम, 10 जनवरी 2017)

अनुवादक – डॉ. विकास सिंह (भारत के बिहार के दरभंगा में स्थित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में संस्कृत के सहायक आचार्य हैं।)


वियतनामी मूल :TÂM LINH: TỪ SỞ THÍCH ĐẾN ĐAM MÊ, TỪ THỰC HÀNH ĐẾN ỨNG DỤNG —

अंग्रेजी अनुवाद: SPIRITUALITY: FROM HOBBY TO PASSION, FROM PRACTICE TO APPLICATION (TÂM LINH: TỪ SỞ THÍCH ĐẾN ĐAM MÊ, TỪ THỰC HÀNH ĐẾN ỨNG DỤNG)
हिंदी अनुवाद: आध्यात्मिकता : रुचि से उत्साह तक, अभ्यास से व्यवहार तक (TÂM LINH: TỪ SỞ THÍCH ĐẾN ĐAM MÊ, TỪ THỰC HÀNH ĐẾN ỨNG DỤNG)
 
  1. Nguyên Thành
    Nguyên Thành says:

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    Dear H.H. Guru

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    Thanks for showing the real meaning of Spirituality and Buddhism.

  6. Tantraupatissa says:

    Dear Guru thanks for sharing this article.

    Also many thanks to our Vajra brother Vikas Singh for translating the article in Hindi language, it will help many Indian learner’s to read and understand in their National language.

    By reading this article I came to understand that many learner’s with limited knowledge feel themselves superior than others. So we should not mistake copper with gold. As mentioned in this article Dharmakirti thaught 5 important rules to followed strictly. They are 1) one should know what needs to be sacrificed or let go 2) one should know the right method or way to sacrifice or let go the things 3) knowing the teachings that needs to be practised 4) knowing the methods to practise the teachings 5) teaching others without expecting anything in return.

    May Guru and his consort live long for sake of other beings.

    May all beings be free from suffering and get enlightened.

    May Vajra brother Vikas Singh legitimate wishes be fulfilled.

    Om Mani Padme Hum…

  7. Dr. Vinod kumar says:

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  8. Advo.S.P.Singh.Choudhary says:

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  9. Mật Hải says:

    Dear Holy Guru,

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    I sincerely pray for the health and longevity of the Guru and his consort for the sake of sentient beings everywhere.

    May the Covid-19 epidemic be eliminated soon.

    Om Mani Padme Hum.

     

  10. Mật Thủy says:

    Dear Holy Guru,

    I’m delighted when finding your article in the Hindi language. I rejoiced with the merit of the translater. May more people approach to your teachings on chanhtuduy.com to gain the right view in simpler expression but with the essence of Dharma.

    May Guru and your consort be healthy to live long for the sake of all setient beings.

    May the Covid-19 epidemic soon come to an end.

    Om mani padme hum!

     

  11. गोविन्द कुमार मीना says:

    विकास भैया द्वारा अनुवादित इस लेख में महत्वपूर्ण जानकारी निहित है. हिन्दी भाषा में अनुदित करने के लिए आपको बहुत-बहुत साधुवाद!!!

  12. Mật Giác Đăng says:

    Dear Guru,

    I am elated with this Hindi version of your article. I am rejoiced with good deed and merit of the translator. May more and more people have chances to approach chanhtuduy.com to read and comment to gain the right view.

    May Guru and your consort have good health and live long for the sake of all sentient beings.

    May the covid-19 pandemic will be soon eliminated.

    May all sentient beings achieve the happiness of Buddha nature.

    Om Mani Padme Hum.

  13. Mật Từ says:

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    Thank you the translator for this article.

    May all sentient beings achieve the happiness of Buddha’s nature.

    Om Mani Padme Hum.

  14. Dr T Morup says:

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